The Civil Procedure Code

Civil Procedure Code

Civil Procedure Code is an act to consolidate and amend the laws relating to the procedure of the Courts of Civil Judicature. This act was cited in 1908 and came into force on 1 January, 1909. The principle strives for justice, efficiency, and predictability in civil proceedings. It defines which court has the authority to hear a case based on geographical location, value, and nature of the dispute. It powers the court, such as issuing summons, enforcing orders, and overseeing judicial proceedings.

It rules about who can file a lawsuit and who can be sued. Discusses the necessity of provisions for adding or substituting parties during ongoing litigation. It also includes filing of suit, procedure, drafting and filing plaints, Rules for notifying defendants as service of summons. CPC guidelines for the contents and form of pleadings with applications such as motions for judgements, interim reliefs, and other pre-trial requests. With proceedings parties obtain necessary documents and information from each other for trial, admit or deny assertions, issuing interlocutory orders means issuing temporary orders.

It frames the issue to identify the precise matters that are in dispute and need to be adjudicated. Trial procedure regulates the presentation of evidence, including witness examination and submission of documents. It also regulates the conduct of the actual hearing, where parties present their cases. It guidelines how judgments should be written, communicated with essential elements, formalizing into a decree specifying the relief granted. By  appeal we can challenge a court’s decision in a higher court. With review a court reconsider its own decision under certain circumstances. By revision, the higher court’s power to modify or overturn decisions of lower courts without an appeal.

CPC details the method with procedures for enforcing court decrees including attachment and auction of property, and arrest, and detention of the judgement debtor. CPC contains general provisions including limits on legal practice, code fees, and procedural exemption for specific types of parties like government entities. The civil procedure code establishes the framework for the conduct of civil trials and is essential for the functioning of courts in civil matters. Similarly other countries have their own versions adapted to their legal systems and needs.

भारत में सिविल प्रक्रिया संहिता

 भारतीय न्यायिक प्रक्रिया संहिता एक महत्वपूर्ण कानून है जो भारतीय न्यायिक प्रक्रिया को व्यवस्थित और संवेदनशील बनाए रखने के लिए बनाया गया है। यह सिविल मुकदमेबाजी की प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है। किसी न्यायालय में किस प्रकार के मामलों पर सुनवाई होगी यह नियम अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत निर्धारित होता है। यह नियम निर्धारित करते हैं कि मुकदमा किन के द्वारा दायर किया जाएगा और किन के खिलाफ दायर किया जाएगा उनकी योग्यताएं क्या होनी चाहिए। यह निर्देशित करता है कि न्यायालय में पेश किए जाने वाले विधिक दस्तावेजों में क्या जानकारी होनी चाहिए। यह नियम निर्धारित करता है कि, कैसे सभी पक्षकारों को विधिक दस्तावेज सौंपे जाने चाहिए। यह निर्धारित करता है कि पक्षकार किस प्रकार न्यायालय में अपने निर्णय की मांग कर सकते हैं और न्यायालय मुकदमे से पहले किस प्रकार के निर्णय कर सकता है। मुकदमे के संचालन के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश को इसमें सम्मिलित किया गया है। 

दोनों पक्षों के बीच मुकदमे से पहले जानकारी का आदान-प्रदान किस प्रकार होना चाहिए, साक्ष्य अवधि के तहत यह नियम तय किया जाता है। न्यायालय के निर्णय किस प्रकार जारी किए जाने चाहिए और उनके क्या परिणाम होंगे इसका निर्धारण निर्णय और आदेश के तहत किया जाता है। न्यायालय के निर्णय को चुनौती देने और न्यायिक आदेशों की समीक्षा के मार्गदर्शन के लिए अपील और संशोधन की प्रक्रिया है। यह न्यायालय के निर्णय को लागू करने की प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। वे सभी अधिकार जो न्यायालय को न्याय के प्रशासन के दौरान सही और उचित कदम उठाने के लिए तथा सही और गलत कार्य को रोकने के लिए आवश्यक है, उन सभी नियमों का उल्लेख न्याय प्रक्रिया संहिता में किया गया है। कोई विधि अपने आप में पूर्ण नहीं होती है और यह सिविल प्रक्रिया संहिता पर भी लागू होती है। अतः जो भी समस्याएं या कठिनाइयां मुकदमे के दौरान आती है उन समस्याओं को न्यायालय अपने अंतर्निहित अधिकारों के अंतर्गत सुलझाती है।

Scroll to Top